ओडिशा पंचायत चुनाव 2027: सत्ता खोने के बाद BJD के लिए साख की लड़ाई, पैठ मजबूत करने में जुटी भाजपा
भुवनेश्वर– ओडिशा में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव साल 2027 के मध्य (संभावित अप्रैल या मई) में आयोजित किए जा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक, देशव्यापी जनगणना की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) इन चुनावों को कराने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। हालांकि, मतदान की आधिकारिक तारीखों का एलान होना अभी बाकी है, लेकिन आयोग ने परिवार-आधारित मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए घर-घर जाकर व्यापक सर्वे शुरू कर दिया है।
चुनावी बिसात: 1 लाख से अधिक पदों पर मुकाबला
आगामी ग्रामीण चुनावों में राज्य की 6,794 ग्राम पंचायतों में सरपंच और पंचायत समिति सदस्य के समान पदों पर मुकाबला होगा। इसके अलावा जिला परिषद सदस्य के 853 पदों और वार्ड सदस्य के 91,000 से अधिक पदों के लिए वोट डाले जाएंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ साबित करने के लिए सभी दलों ने अभी से रणनीतियां बनानी शुरू कर दी हैं।
मुख्य मुकाबला: भाजपा बनाम बीजद
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दो दशकों के इतिहास को देखें तो कांग्रेस राज्य में मुख्य मुकाबले से लगभग बाहर दिख रही है। ऐसे में यह चुनाव सीधे तौर पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और 2024 में सत्ता गंवाने वाली बीजू जनता दल (BJD) के बीच एक बड़ी ‘अग्निपरीक्षा’ साबित होने वाला है।
- भाजपा की रणनीति: मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के नेतृत्व में राज्य की सत्ता पर काबिज होने के बाद भाजपा अब ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने की पुरजोर कोशिश कर रही है। इसके लिए उच्च स्तरीय संगठनात्मक बैठकें की जा रही हैं। हाल ही में छात्र संघ चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की एकतरफा जीत से भाजपा कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं।
- बीजद के सामने गढ़ बचाने की चुनौती: 24 साल तक ओडिशा की सत्ता पर राज करने के बाद 2024 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने वाली नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी के लिए यह साख बचाने की लड़ाई है। पार्टी गांवों में अपने पारंपरिक गढ़ को वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है।
बीजू जनता दल के भीतर ‘लीडरशिप’ पर उठते सवाल
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीजू जनता दल हमेशा नवीन पटनायक के चेहरे के दम पर चलती रही है। लेकिन 2024 के चुनावों में कार्यकर्ताओं ने जिस नौकरशाही शक्ति (ब्यूरोक्रेसी) का खुलकर विरोध किया था, आज पार्टी की कमान परोक्ष रूप से सुजाता राऊत के हाथों में देखी जा रही है। वर्तमान में बीजद का एक भी सांसद संसद में नहीं है और पार्टी राज्य सरकार से भी बाहर है। ऐसे में नवीन पटनायक के बाद सुजाता राऊत के नेतृत्व पर जनता और कार्यकर्ता कितना भरोसा जताएंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
दूसरी तरफ, कांग्रेस इसे एक अहम अवसर के रूप में देख रही है, जिसके जरिए वह ग्रामीण निकायों में अपनी खोई हुई जमीन को फिर से तलाशने और अपनी मौजूदगी का आकलन करने का प्रयास करेगी।
किसका पलड़ा भारी?
ओडिशा की सियासत का इतिहास रहा है कि आमतौर पर जिस दल की सरकार राज्य में होती है, पंचायत और नगर निकाय चुनावों में भी उसी का दबदबा रहता है। हालांकि, ऊंट किस करवट बैठेगा और ग्रामीण जनता किस पर भरोसा जताएगी, यह तो 2027 के चुनावी नतीजे ही तय करेंगे।