जनसंघ से भाजपा का सफर: ३ सीटों से शुरू हुई राष्ट्रवाद की यात्रा, धारा ३७० के खात्मे तक
झारसुगुड़ा- भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तक की राजनीतिक यात्रा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में राष्ट्रवाद और वैचारिक दृढ़ता का सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष १९५१ में जनसंघ की शुरुआत ऐसे समय में हुई थी जब भारत को गणतंत्र बने मात्र एक वर्ष हुआ था। देश विभाजन की भीषण त्रासदी से उबरते हुए अपने पहले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटा था। करोड़ों विस्थापितों के पुनर्वास की गंभीर चुनौती देश के सामने थी। इसी दौरान जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद ३७० लागू किया जा चुका था और नेहरू-लियाकत समझौते ने भविष्य की राजनीतिक समस्याओं का धरातल तैयार कर दिया था। ऐसे नाजुक मोड़ पर, जब देश को ‘राष्ट्रवाद’ की एक मजबूत विचारधारा की सख्त जरूरत थी, तब जनसंघ का उदय हुआ।
पहले चुनाव से एनडीए की नींव तक का संघर्ष
जनसंघ राष्ट्रवाद के इसी मुख्य एजेंडे के साथ १९५२ के पहले लोकसभा चुनाव में उतरा। इस चुनाव में पार्टी को ३.०६ प्रतिशत वोट मिले और महज तीन सीटों पर जीत हासिल हुई। संसद में संख्या बल कम होने के बावजूद जनसंघ ने ३७ गैर-कांग्रेसी सांसदों को एकजुट किया और देश में पहली बार ‘नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस’ (NDA) की मजबूत आधारशिला रखी। इसके बाद पार्टी का जनाधार लगातार बढ़ता गया। वर्ष १९६७ के लोकसभा चुनाव में जनसंघ का ग्राफ ऊपर चढ़ा और उसे ९.३१ प्रतिशत वोट के साथ ३५ सीटों पर ऐतिहासिक कामयाबी मिली।
आपातकाल, जनता पार्टी में विलय और भाजपा का जन्म
देश में आपातकाल (इमरजेंसी) हटने के बाद, वर्ष १९७७ में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनाने के उद्देश्य से जनसंघ ने बड़ा त्याग करते हुए अपना विलय जनता पार्टी में कर लिया। हालांकि, वैचारिक मतभेदों के चलते १९८० में जनता पार्टी का विघटन हो गया। इसके बाद ६ अप्रैल १९८० को ‘भारतीय जनता पार्टी’ (भाजपा) के रूप में एक नए दल का गठन हुआ।
२ सीटों का झटका और १९८९ में धमाकेदार वापसी
भाजपा के गठन के बाद १९८४ के आम चुनाव में पार्टी को भारी झटका लगा और वह केवल २ सीटों पर सिमट गई। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में किसी भी राजनीतिक दल का टूट जाना स्वाभाविक था, लेकिन भाजपा ने हार नहीं मानी। पार्टी ने अपने संगठन को नए सिरे से मजबूत किया और १९८९ के चुनाव में ८५ सीटें जीतकर भारतीय राजनीति में धमाकेदार वापसी की। इस बढ़ते कदम के साथ वर्ष १९९६ में पहली बार केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने।
मोदी युग और वैचारिक संकल्पों की पूर्णता
वर्ष २०१४ से लेकर आज तक केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार लगातार पूर्ण बहुमत के साथ शासन में है और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। वर्तमान में देश के अधिकांश राज्यों में भी भाजपा की सरकारें मजबूती से काम कर रही हैं। इस अभूतपूर्व सफलता के बाद भी आज भारतीय जनता पार्टी अपनी वैचारिक यात्रा के मूल सिद्धांतों—’राष्ट्र प्रथम’, ‘अंत्योदय’ और ‘एकात्म मानववाद’ पर टिकी हुई है। कश्मीर के ‘परमिट राज’ के विरोध में जनसंघ ने जिस ऐतिहासिक संघर्ष की शुरुआत की थी, उसे मोदी सरकार ने वर्ष २०१९ में अनुच्छेद ३५ए और धारा ३७० को हमेशा के लिए हटाकर पूरी तरह साकार कर दिया है।