विकास के बड़े दावों के बीच बेरोजगारी और स्थानीय व्यापारियों की उपेक्षा
औद्योगिकीकरण का 26 साल:
झारसुगुड़ा-पश्चिम ओडिशा में सन 2000 के दशक की शुरुआत में जब औद्योगिक क्रांति की बयार बही, तो स्थानीय निवासियों की आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने थे। लोगों को उम्मीद थी कि इन बड़े कारखानों के आने से क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और उनकी आने वाली पीढ़ियों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। इसी उम्मीद में हजारों परिवारों ने अपनी पैतृक जमीनें, यहां तक कि अपने पुश्तैनी मकान तक कारखानों के लिए छोड़ दिए। लेकिन आज 26 साल बाद जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जिन कारखानों को प्रगति का पहिया माना जा रहा था, आज वे स्थानीय लोगों के लिए केवल प्रदूषण और बेरोजगारी की वजह बनकर रह गए हैं।
शुरुआती उम्मीदें और फिर दबंगई का दौर
कारखानों के निर्माण के शुरुआती दौर में स्थानीय लोगों को निर्माण कार्यों में कुछ रोजगार जरूर मिला। लेकिन जैसे ही ये प्लांट पूरी तरह से बनकर तैयार और स्थापित हो गए, वैसे ही स्थानीय कार्यबल की भूमिका धीरे-धीरे खत्म कर दी गई। आरोप है कि रोजगार और ठेकों का नियंत्रण आम जनता के हाथों से निकलकर कुछ दबंग नेताओं के सिंडिकेट में सिमट गया। नतीजतन, जमीन गंवाने वाले मूल निवासी आज बुनियादी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि उनके हिस्से में सिर्फ जहरीली हवा और प्रदूषित पानी आया है।
सत्ता परिवर्तन से जगी उम्मीदों पर फिर फिरा पानी?
ओडिशा में करीब 24 साल तक एक ही दल बीजू जनता दल की सरकार रही, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि कोई भी सरकार इन बड़े औद्योगिक घरानों पर नकेल कसने में पूरी तरह सफल नहीं रही। राज्य में हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद स्थानीय छोटे व्यापारियों और बेरोजगार युवाओं में एक नई उम्मीद जगी थी। स्थानीय स्तर पर छोटे-मोटे काम मिलने भी शुरू हुए थे, लेकिन कारखानों ने अब एक नया पैंतरा अपना लिया है।
नियमों में बदलाव
स्थानीय व्यापारियों का आरोप है कि अब कारखाने अपने निविदा दस्तावेजों में ऐसी कड़ी शर्तें और खंड जोड़ रहे हैं, जिससे स्थानीय और छोटे उद्यमी दौड़ से सीधे बाहर हो जाएं। हाल ही में एक प्रमुख कारखाने द्वारा जारी किए गए ‘राख ढुलाई’ के टेंडर ने इस विवाद को और हवा दे दी है।
इस नई निविदा में शर्त रखी गई है कि केवल वही संस्था आवेदन कर सकती है जिसका सालाना टर्नओवर 40 करोड़ रुपये से अधिक हो और जिसके पास 1 लाख टन राख ढुलाई का पूर्व अनुभव हो। चौंकाने वाली बात यह है कि इसी कारखाने के पिछले टेंडर में ऐसी कोई शर्त नहीं थी। इन भारी-भरकम शर्तों के कारण कोई भी स्थानीय युवा या छोटा व्यापारी इस प्रक्रिया में शामिल होने के योग्य ही नहीं बचा है।